मेरी मर्जी का न कोई दिन और कोई रात नहीं A
हम मूरत बन बैठे हैं] जैसे हम में कोई ज़ज्बात नहींA
मेरी मर्जी.........
जाने कब से तरसते हैं] खुशियों के लिए।
उम्र बीत गयी खुशियों] से मुलाकात नहीं ।
मेरी मर्जी.........
आदत सी हो गई] झुककर चलने की ।
लगता है ज़माने में] मेरी कोई औकात नहीं।
मेरी मर्जी.........
हर रंग से भर दिया] दमन उनका ।
खेल किस्मत का] मेरे हिस्से में कोई सौगात नहीं।
मेरी मर्जी.........
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